Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 62, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
मृद्व्या चिदाकाशमृदा ब्रह्मणा ब्राह्मणेन खे ।
कृतोऽपि न कृतः सर्गमण्डपोऽक्षगवाक्षकः ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
कोमल चिदाकाशरूप मिट्टी से हिरण्यगर्भनामक ब्राह्मण ने इन्द्रियरूपी
झरोंखों से युक्त देहादि सृष्टिरूप मण्डप का यद्यपि निर्माण किया है, फिर भी उसका वह निर्माण
नहीं के बराबर है