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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, Verse 12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 63, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

प्रत्येकमन्तरन्यानि तथैवाभ्युदितानि च । परस्परमदृष्टानि बहूनि विविधानि च ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

केले की छाल की रचना की तरह परस्पर भीतर-ही- भीतर अनन्तरूप में इनकी स्थिति का अनुभव होने से भी ये सी मिथ्या हैं; इसलिए स्वप्नग्राग्य हैं ही, यह कहते हैं । प्रत्येक जगत्‌ के भीतर परस्पर एक दूसरे से न देखे गये अनेक भिन्न -भिन्न स्वरूप के ये जगत्‌ वैसे ही उदित हुए हैं, जैसे केले की छाल