Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 63, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
अन्योन्यं तानि सर्वाणि न पश्यन्त्येव किंचन ।
जडानीवैकराशीनि बीजानीव गलन्त्यपि ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
उसीका पुनः उपपादन करते हैं /
वे सब जगत् परस्पर एक दुसरे को कदापि कुछ नहीं देख पाते तथा कोठी के भीतर रखे गये
जड़ बीजों की एक राशि की तरह भीतर ही भीतर नष्ट भी हो जाते हैं