Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 63, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
व्योमात्मत्वान्न गगनं न विदन्ति परस्परम् ।
अपि चेतनरूपाणि सुप्तानीव निरन्तरम् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
नष्ट हो जाने पर भी
वे चेतनरूप ही रहते हैं, तपे हुए खप्पर (भिक्षापात्र) में गिरे हुए जलबिन्दु के सदृश शून्यरूपता
प्राप्त कर शून्यस्वरूप ही नहीं हो जाते । हम लोगों की तरह वे परस्पर देखते भी नहीं, किन्तु
अज्ञान से इनका चेतन रूप ढक जाने के कारण निरन्तर सोये हुए-जैसे स्वप्नका ही अनुभव करते
हैं