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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 63, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

सुप्ताः स्वप्नजगज्जाले स्वाचारव्यवहारिणः । पुरुषा निहताः पुंभिस्ते तथैव व्यवस्थिताः ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी तरह मनुष्य भी अपने स्वप्नरूप जगत्‌-समूह में वासनाओं के कारण अपना-अपना आचार और व्यवहार करते हैं तथा वे स्वप्न के मनुष्य स्वप्न के अन्य पुरुषों से मार दिये जाने पर पूर्वोक्त असुर जीवों के सदृश स्वप्नपरम्परा में ही स्थित रहते हैं