Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 63, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
निर्मोक्षा निःशरीरास्ते चेतनावासनान्विताः ।
दृष्टं स्वप्नजगज्जालं विना च क्व वसन्तु ते ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
चूँकि वे भी ज्ञान न होने के कारण
मोक्षरहित और शरीरशन्य ही रहते हैं, इसलिए वे जाग्रत में समर्थ और वासनाओं से व्यवहारशील
नहीं होते अतः चेतना और वासना से युक्त ऐसे मनुष्य दृष्टस्वप्नरूप जगत्समूह के सिवा कहाँ
निवास करें ? स्वप्न के सिवा उनकी कोई दूसरी गति नहीं है, यह तात्पर्य है