Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 63, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
वर्णोच्चारोऽभविष्यच्चेत्प्रकटार्थस्ततः क्वचित् ।
स्वप्नेष्वन्वभविष्यत्तं विनिद्रः पार्श्वगो जनः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त अर्थ में अनुकूल तथा विपक्ष में प्रतिकूल तर्क उपस्थित करते हैं /
यदि कहीं स्वप्नों मे वर्णो का उच्चारण परमार्थ होता है तो फिर पास में स्थित जागे हुए पुरूष
को भी उसका अनुभव होता अर्थात् समीपस्थ जाग्रत पुरुष भी उसे सुन पाता