Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 63, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
तस्मान्न किंचित्स्वप्नेषु तत्सत्यं भ्रान्तिरेव सा ।
चिन्मात्राकाशकचनं तत्तथा खे स्वभावजम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए स्वप्न
में उसकी सत्यता कुछ भी नहीं है, वह एकमात्र भ्रांति ही हैं। निद्रास्वभाव बल से कल्पित चिदाकाशमात्र
का वह स्फुरण चिदाकाश में ही है