Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 63, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
तेषामन्तर्जनाः सन्ति जनं प्रति पुनर्मनः ।
पुनर्मनः प्रति जगज्जगत्प्रति पुनर्जनः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
उतनी सख्या से भी संसार की संख्या समाप्त नहीं हो जाती, इसलिए अनवस्था बराबर बनी
हुई है, जो एकमात्र माया का ही अलंकार है, इस आशय से कहते हैं /
तथा उन जीवों के वासना के अन्दर अनेक जीव हैं और उन अनन्त जीवों के अनन्त मन
हैं । उनमें भी प्रत्येक मन के भीतर असंख्य संसारमण्डल हैं, पुनः उन संसारमण्डलों के अनेक
संसार हैं, फिर उन संसारों में भी प्रत्येक संसार में अनेक जीव हैं, पुनः उन जीवों के अनेक
मन हैं और उन मनों के अनेक संसार है