Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 63, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
इत्थमाद्यन्तरहित एष दृश्यमयो भ्रमः ।
ब्रह्मैव ब्रह्मवित्पक्षे नात्रेयत्तास्ति काचन ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह आदि और अन्त से शून्य यह
दृश्यमान भ्रम बराबर चला ही जा रहा है। इसका कहीं पर ओर-छोर नहीं है । लेकिन हाँ,
ब्रह्मज्ञानी के पक्ष में यह सब कुछ ब्रह्मरूप ही स्थित है