Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 63, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
तच्चिदाकाशकचनं यन्नाम स्वप्नवेदने ।
आकाशमेव नभसः कचनं विद्धि नेतरत् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे आकाश का मूर्तरूप से स्फुरण आकाश से भिन्न नहीं है, वैसे ही
वह चिदाकाश का स्फुरण आदि भी, जो स्वप्नज्ञान में जगदाकार से प्रसिद्ध है, उस चिदाकाश से
भिन्न नहीं है । हे श्रीरामजी, उसे आप चिदाकाशरूप ही समझिये