Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 64, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
ततस्तत्कुवलोल्लासिमालतीमाल्यलोचना ।
ललना ललितालोक्य लीलयाऽऽलपिता मया ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
आसंगिक विषय का निरूपण कर अब महाराज वस्निष्ठजी प्रस्तुत कथा का अवशिष्ट भाग
कहते हैं /
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, तदनन्तर उस ललित ललना को देखकर मैंने कौतुकसे
उससे पूछा, उसके नेत्र कमल के सदृश उल्लास से भरे थे और कटाक्षमालाओं से मालती माला के
सदृश भले लगते थे
सर्ग सन्दर्भ
तिरसठवाँ सर्ग समाप्त चौसठवाँ सर्ग वसिष्ठजी के प्रश्न करने पर विद्याधरी द्वारा विस्तार के साथ वैराग्यपर्यन्त अपने घर मेँ जन्म आदि का निरूपण ।