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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, Verse 31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 64, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

क्वचिन्निर्भूतमुद्यातः क्वचिदुन्मत्तराक्षसः । क्वचित्करञ्जगहनः क्वचित्तालमहावनः ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

कहीं पर तो प्राणियों से शून्य होकर ही व्यर्थ का उन्नत बना है, कहीं पर लम्बी मरुभूमि ही पड़ी है, कहीं पर करंज वृक्षों के कारण वह अतिगहन है, कहीं पर ताल के ही बड़े-बड़े वन उसमें विद्यमान हैं