Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 64, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
शिखरेषु शिलास्तस्य सामान्याचलसंनिभाः ।
सन्ति सुस्थितकल्पाभ्रा रत्नमय्योऽम्बरामलाः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
अधिक क्या कहूँ, महाराज, उसके शिखरो पर ऐसी रत्नमयी बड़ी-बड़ी शिलाएँ
हैं, जो कि छोटे-छोटे पर्वतो के समान यानी सह्य, मलय आदि पर्वतो के सदुश लगती हैं, उनको
देखकर सुस्थिर मेघ का ही स्मरण हो उठता है ओर वे एकदम आकाश के सदृश निर्मल हैं