Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 64, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
तासामुत्तरदिग्भागे पूर्वशृङ्गशिलोदरे ।
निवसाम्यहमक्षीणवज्रसारसमत्वचि ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
भगवन्, उन शिलाओं के मध्य में उस पर्वत के उत्तर दिशा के भाग में पूर्व
दिशा की ओर स्थित शिखर की जो शिला है, उसके अन्दर मैं निवास करती हूँ, विनष्ट न होनेवाले
वजसारमणि के सदृश उसका अविनाशी त्वचाभाग है