Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 64, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
परमाकाशकोशस्य कस्मिंश्चित्कोणकोटरे ।
युष्माकं संस्थितं किंचिदिदं तावज्जगद्गृहम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
पहले अपने घर को बतलाने के लिए उपक्रम करती ह /
महाराज प्रकाशरूप चिदाकाश के कोश के किसी एक कोने में कोई यह आपका जगद्रूप घर
स्थित है