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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 64, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

विद्याधर्युवाच । मुने शृणु यथावत्त्वमात्मोदन्तं वदाम्यहम् । प्रष्टुमर्हसि विस्रब्धमार्तां करुणयार्थिनीम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

विद्याधरी ने कहा : हे मुने, आप सुनिये, मैं अपना वृत्तान्त जैसा है, वैसा आपसे कहती हूँ । यद्यपि एकान्त में परस्त्री से सम्भाषण नहीं करना चाहिए, तथापि दुःखशान्ति के लिए प्रार्थना करनेवाली मुञ्जसे तो आप एकान्त में दया से पूछ सकते हैं, क्योकि दुःखियों को आश्वासन देना सज्जनो का धर्म हे