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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, Verses 45–48

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 64, verses 45–48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 45-47

संस्कृत श्लोक

तेन जातेन मद्भर्त्रा बालेनैव सता पुरा । किंचिज्ज्ञेन सतैकेन तिष्ठतात्मालयेऽमले ॥ ४५ ॥ श्रोत्रियत्वानुरूपेण जाया मे जन्मशालिनी । कुतः संभवतीत्येव निर्णीय चिरचिन्तया ॥ ४६ ॥ स्वयमेवानवद्याङ्गी तेन तामरसेक्षण । उत्पादितास्मि नाथेन ज्योत्स्नेव शशिनाऽमला ॥ ४७ ॥ मनसा मानसीभार्या मन्दरोत्तमसुन्दरी । ततो वृद्धिं प्रयातास्मि वसन्त इव मञ्जरी ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

भगवन्‌, पहले की बात है जिस समय उत्पन्न हुए मेरे स्वामी की अभी बाल्यावस्था ही थी, कुछ ज्ञान भी उनको था, वे सज्जन थे, अपने निर्मल स्थान में अकेले ही रहते थे, उस समय उन्होंने विचार किया - मैं जैसे स्वाध्यायनिष्ठ हूँ, वैसी ही अनुरूप मेरी भार्या कैसे उत्पन्न हो सकती है । यों दीर्घकालतक विचार करके उन्होने कुछ निश्चय किया, फिर हे कमल के सदुश नेत्रोवाले मुने, उस मेरे पति ने स्वयं ही अनिन्दित अंगोंवाली मेरा ऐसे निर्माण किया, जैसे निर्मल ज्योत्स्ना का चन्द्रमा करता हे