Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 64, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
शृणु तेन कथं ब्रह्मन्भार्याहं समुपार्जिता ।
कथं वृद्धिमयं यातः स्नेहोऽस्माकमकृत्रिमः ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्मन्, आप सुनिये-उन्होंने
मुझको भायरिप में कैसे प्राप्त किया और हम लोगों का यह स्वाभाविक प्रेम कैसे बढ़ा