Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 64, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
अहं व्यसनिनी भार्या तस्य वेदविदां वर ।
न निमेषं समर्थास्मि तं विना देहधारणे ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ, ऐसे पुरुष की मैं पत्नी बड़ी ही व्यसनिनी हूँ, एक
क्षणमात्र भी उनके बिना देहधारण में शक्ति नहीं रखती