Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 64, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
आबाल्याद्ब्रह्मचारी च श्रोत्रियः पाठकोऽलसः ।
एकान्त एक एवास्तेऽजिह्मवृत्तिरचापलः ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
मेरे पति
बाल्यकाल से ही ब्रह्मचारी हैं, अपने वेदाध्ययन में परायण रहते हैं, अन्य को पढ़ाते हैं, आलसी हे,
उनका व्यवहार बड़ा ही कोमल है, उनमें इन्द्रियो की चंचलता का नाम निशान नहीं है, एकान्त में
ही सदा रहते हैं