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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, Verse 52

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 64, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 52

संस्कृत श्लोक

लीलाविलासैकरता हेलावलितलोचना । गेयवाद्यप्रिया नित्यं न च तृप्तानुरागिणी ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

मैं निरन्तर केवल लीलाविलासों में ही निरत रहने लगी, कौतुकसे तिरछे कटाक्ष मेरे होने लगे, मैं सदा गान और वाद्य में प्रम करने लगी, भोगों से कभी तृप्त न हुई, मेरा दिनपर दिन भोगों में अनुराग बढ़ता ही गया