Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 64, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
न केवलमहं गेहं धारयामि द्विजन्मनः ।
यावत्त्रैलोक्यसदनमिदमङ्ग बिभर्म्यहम् ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रिय मुने, मैं केवल अपने ब्राह्मण पति के घर को ही धारण नहीं करती , परन्तु पति के
मनोमयरूप मैं उनके मन से कल्पित समस्त त्रिलोकी को धारण करती हूँ