Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 64, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
अहं कुलकरी भार्या कलत्रभरणक्षमा ।
त्रैलोक्यगृहसंभारधारणैकभरोद्वहा ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
मुनिवर, मँ पुत्र,
पौत्र आदि से कुलको बढ़ाने वाली भार्या हूँ, मे पोष्यवर्ग का पालन करती हूँ और मुझमें त्रिलोकीरूप
घर की सर्वविध सामग्री के भार को ढोने की पूर्ण सामर्थ्य है