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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, Verse 62

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 64, verse 62 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 62

संस्कृत श्लोक

अहं पुष्करमन्दारकुमुदोत्करमालिता । भृशं दाहमवाप्नोमि कण्टकेष्विव दोलिता ॥ ६२ ॥

हिन्दी अर्थ

मेरे शरीर के दाह की शान्ति के लिए सखियाँ मुझे पुष्कर, मन्दार, कुई आदि फूलों की शय्यापर सुला देती हैं, परन्तु मैं इसपर भी खूब दाह का अनुभव करती हूँ, जिस तरह काँटोंपर लुढकती हुई रमणी