Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, Verse 64
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 64, verse 64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 64
संस्कृत श्लोक
यत्कान्तमुचितं स्वादु विचित्रं चित्तहारि च ।
तदालोक्य भवाम्यन्तर्बाष्पपूर्णायतेक्षणा ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्मन्, जो पदार्थ सुन्दर, उचित, स्वादु,
विचित्र ओर मनोहर है, उन्हे देखकर मैं अपने भीतर से अश्रुपूर्णनेत्र हो जाती हूँ-मेरी वे बड़ी-बड़ी
आँखें आँसुओं से भर जाती हैं