Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, Verse 67
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 64, verse 67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 67
संस्कृत श्लोक
तुषारनिकराकीर्णं कदलीदलमण्डपम् ।
पश्याम्यूष्माणमुज्झन्तं खदिराङ्गारभीषणम् ॥ ६७ ॥
हिन्दी अर्थ
हिमकणों के निकर से संकीर्णं केले के पत्तों से बनाये गये मण्डप को
मैं गर्मी उगलने वाले खैर के अंगार के सदृश भीषण ही देखती हूँ