Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 65, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 65, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 65 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
मद्भर्ता केवलं शुद्धवेदार्थैकान्तचिन्तया ।
न च यातं न चायातं वेत्त्यहो विगतैषणः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
मेरे स्वामी तो केवल वेदों के अर्थ के विचार में ही सदा मग्न रहते हैं, इससे
वे यह जानते ही नहीं कि कितना समय बीत गया, कितना वर्तमान है, कितना भविष्यत् है, क्या
ब्रह्मतत्त्व है । अहो, वे कितने निस्पृह है