Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 65, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 65, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 65 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
भ्रमन्ती सिद्धसेनासु सदा नभसि मानद ।
त्वदृते नेह पश्यामि घनाज्ञानदवानलम् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
ङस अर्थ के निमित्त ठुमने दूसरे किदो से प्रार्थना क्यो नहीं की, इस पर कहती हैं /
हे मानद, आकाशमण्डल में सिद्धसमूहों मे निरन्तर घूम-फिर रही मैं आपके सिवा दूसरे किसी
को भी अज्ञानरूपी वनका दावानल नहीं देखती