Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 66, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 66, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 66 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
स्वदशास्वादनरता वातयन्त्रसुचारिता ।
रोदःसद्मनि सूर्याख्या दीप्यते दिवि दीपिका ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँ भी सूर्य नाम की दीपिका, जो कि दसों दिशारूपी वृत्तियों का स्वाद लेने में (यानी
द्रवात्मक स्नेह का भोग करने के लिए) रत और वात रूपी यन्त्र से चालित है । वह अन्तरिक्ष एवं
पृथ्वीरूप घर के अन्दर जगमगाती है