Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 66, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 66, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 66 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
वृक्षोर्व्यब्ध्यद्रिखचराः प्राणिनोन्तः स्फुरन्त्यलम् ।
मृतिजन्मोन्मुखाः कीटसुरासुरजलौकसः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँ पर भी जनम और मरण
के भागी बन्दर आदि वृक्षचर, मनुष्य आदि भूचर, मत्स्य आदि जलचर, मृग आदि पर्वतचर,
पक्षी, देवता आदि आकाशचर, कीट, सुर, असुर और जलनिवासी बीच-बीच में खूब घूमते
फिरते हैं