Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 66, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 66, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 66 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
विद्याधर्युवाच ।
मुने यथेदं भवतां जगत्स्फारं विराजते ।
तथास्माकं जगत्तत्र सर्गसंसारयुक् स्थितम् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
आपने जितने की अर्नंभावना की हैं, उतना ही उसमें हैं, यह बात नहीं हैं, किन्तु ऐसा दूसरा
श्री जग्रत् उसमें है, यों विद्याधरी प्रश्न का उत्तर देती हैं /
विद्याधरी ने कहा : हे मुने, जैसे आपका यह जगत् विस्पष्टरूप से विराजमान है, वैसे ही
हमारा भी जगत् उस शिलापेट में विराजमान है, वह भी सृष्टिरूप संसार से युक्त है