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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 66, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 66, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 66 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

स्फुरन्ति नागाः पाताले तिष्ठन्ति भुवि पर्वताः । आपश्छलछलायन्ते वहन्ति व्योम्नि वायवः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

वहाँ भी पाताल में नाग रहते हैं । पृथ्वी पर पर्वत स्थित है, जल भी लबालब भरें हैं और आकाश में हवा भी चलती है