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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 67, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 67, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

विद्याधर्युवाच । यावत्तं सर्गमागच्छ प्रसादः क्रियतां मुने । आश्चर्येषूपपन्नेषु महान्तो ह्यतिकौतुकाः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

विद्याधरी ने कहा : हे मुने, यदि आप मेरी बात को असंभव मानते हों, तो स्वयं ही उस सम्पूर्ण शिलोदर सृष्टि को देखने के लिए कृपा कीजिए और वहाँ चलिए, क्योंकि बड़े लोगों को प्राप्त आश्चर्यकारक घटनाओं में बड़ा ही कौतुक होता है

सर्ग सन्दर्भ

छासठवाँ सर्ग समाप्त सड़सठवाँ सर्ग कौतुक से महाराज वसिष्ठजी का शिला के पास जाना, वहाँ जगत्‌ न देखना और उनके पूछने पर विद्याधरी का अभ्यास की महिमा कहना।