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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 67, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 67, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

तथेत्युक्ते मया सार्धं गन्तुमारब्धमम्बरे । वात्यया सौरभेणेव शून्ये शून्येन शून्यया ओ ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र, श्रीरामजी, उस तरह उसके कहने पर मैंने "तथास्तु" कहकर उसकी बात स्वीकार कर ली और आकाशरूपिणी उस रमणी के साथ शून्यात्मक आकाशमण्डल में जाने के लिए शून्यरूप मैं ऐसे उद्यत हुआ, जैसे झंझावात के साथ चम्पकादि पुष्पों की सुगन्ध