Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 67, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 67, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
विद्याधर्युवाच ।
पश्याम्यखिल नात्मीयमहं सर्वमिहोपले ।
मुकुरप्रतिबिम्बस्थपुरान्यपुरवज्जनम् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
विद्याधरी ने कहा : भगवन्, मैं भी अब पहले के सदुश अपना सब कुछ इस पत्थर की
शिला में नहीं देख रही हूँ । पर मैंने जिन मनुष्य, गन्धर्व आदि का पूर्व में वर्णन किया है,
उन सबको मैं दर्पण में प्रतिबिम्बिरूप से स्थित जो प्रसिद्ध नगर से दूसरा नगर है, उसके सदृश
प्रतिबिम्बरूप से स्थित देखती हूँ