Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 67, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 67, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
अहं शिष्याबला बाला पश्यामि त्वं न पश्यसि ।
सर्वज्ञोऽपि शिलासर्गं पश्याभ्यासविजृम्भितम् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
अभ्यास में उत्तमता होने पर बालकों में भी ग्रोढता देखी जाती है और अभ्यास के छूट जानेपर
बड़े लोगों को भी व्यामोह होने लगता हैं, इस विषय मे हम दोनों ही दरष्टांत हैं; यह कहती है /
मैं एक शिला की अबला हूँ, उसमें भी बाला और आपकी शिष्या हूँ, फिर शिला की सृष्टि को
देखती हूँ, आप सर्वज्ञ और गुरु हैं तो भी नहीं देखते, यह बड़ा आश्चर्य है, देखिए तो यह अभ्यास
का चमत्कार