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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 67, Verse 33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 67, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

दुःसाध्याः सिद्धिमायान्ति रिपवो यान्ति मित्रताम् । विषाण्यमृततां यान्ति संतताभ्यासयोगतः ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

निरन्तर के अभ्यास से दुःसाध्य पदार्थ सिद्ध हो जाते हैं, शत्रु मित्र बन जाते हैं तथा औषध के निमित्त अभ्यास से विष भी अमृत बन जाते हैं