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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 68, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 68, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

उद्यत्प्रथममध्यक्षं जीवस्य प्रथमं वपुः । मनः प्रत्यक्षमित्युक्तं तत्तेनाद्यैव दुर्धिया ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

तब आपने यह पहले कैसे कहा है कि मन जीव का आतिवाहिक शरीर है, इस पर कहते हैं / सृष्टि के आकार से उदित हो रहा वही चित्सत्तारूप प्रथम प्रत्यक्ष चिदाभासात्मक जीवका हिरण्यगर्भसंज्ञक समष्टिरूप आतिवाहिक शरीर होता है और वही फिर समष्टिभाव को अपनी दुर्बुद्धि से भूलकर शीघ्र ही जब व्यष्टिभाव को प्राप्त कर लेता है तब सर्वजनप्रत्यक्ष मन, इस नाम से कहा जाता है । इसीलिए तो हमने आपसे पहले यह कहा है कि जीव का आतिवाहिक शरीर मन है