Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 68, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 68, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
योगिप्रत्यक्षमित्युक्तं मनःप्रत्यक्षमित्यपि ।
तत्स्वमेव चितो रूपं गतमेवान्यतां मुधा ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार स्वयं वही चिति का रूप अज्ञान के कारण व्यर्थ ही अन्यरूपता को प्राप्त हो
गया है । समष्टिरूपसे वह योगियों को प्रत्यक्ष है, इसलिए वह योगिप्रत्यक्ष और व्यष्टिरूप से
सर्वजनसाधारण को प्रत्यक्ष है, इसलिए मन:प्रत्यक्ष भी कहा गया है