Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 68, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 68, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
अनुभूतापि नास्त्येव हेम्नः कटकता यथा ।
तथातिवाहिकस्याधिभौतिकत्वं न विद्यते ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे अनुभव करने पर सुवर्णं में कटकता बिलकुल नहीं है, वैसे ही सूक्ष्म शरीर में
आधिभौतिकता (स्थूल शरीरता) भी वस्तुतः नहीं है