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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 68, Verses 32–33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 68, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

प्रत्यक्षेणैवमध्यक्षं प्रत्यक्षं प्रविचार्यताम् । यदाद्यं तत्सदध्यक्षं तत्प्रत्यक्षेण दृश्यताम् ॥ ३२ ॥ लोकत्रयानुभवदं त्यक्त्वा प्रत्यक्षमैहिकम् । मायात्मकं यो गृह्णाति नास्ति मूढतमस्ततः ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्वोक्‍्त को ही दृढ़ करने की इच्छा करते हुए फिर कहते हैं / हे श्रीरामचन्द्रजी, इस तरह साक्षी चेतन द्वारा आप प्रत्यक्ष विचार कीजिये तथा स्वयं अपने अनुभव से देखिये, जो सबका आदि साक्षी चित्‌ का प्रत्यक्ष है वही वास्तविक सुख है