Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 68, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 68, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
आतिवाहिकमेवैषां भूतानां विद्यते वपुः ।
अत्राधिभौतिकव्याप्तिरसत्यैव पिशाचिका ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
तीनों
लोक के अनुभव देनेवाले सूक्ष्मातिसूक्ष्म प्रत्यक्ष को छोड़कर जो ऐहिक स्थूल प्रत्यक्ष को ग्रहण
करता है, उससे बढ़कर और कोई दूसरा बड़ा मूर्ख नहीं है ॥३ ३॥ सम्पूर्ण भूतों का जो सूक्ष्म शरीर
(५) प्रत्यक्ष चिति के अधीन इसकी सिद्धि होने से वह मानस स्पंद कुछ है, अतः उसकी
प्रत्यक्षचितिसमसत्ता नहीं है, इसलिए वस्तुतः वह भी मिथ्या ही है यह तात्पर्य है ।
है वही वास्तव में सत् है । इसमें जो स्थूलशरीर की प्राप्ति है वह असत्य पिशाचिका ही है