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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 68, Verse 35

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 68, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

अजातसंकल्पमयं प्रत्यक्षं सत्कथं भवेत् । स्वयमेव न यत्सत्यं तत्स्यात्कार्यकरं कथम् ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

जहाँ पिथ्या सकल्पमय का जन्म ही दुर्लभ है वहाँ उसकी सत्ता तो अत्यन्त दुलभ हैं ही, फिर उत असद्‌ पवार्थ में अर्थक्रिया की सामर्थ्य तो उससे भी और बहुत दूर है, यह कहते हैं / जो अनुत्पन्न और संकल्पमय है वह प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है तथा जो स्वयं ही सत्‌ नहीं है वह कार्यकारी कैसे हो सकता हे ?