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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 68, Verse 36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 68, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 36

संस्कृत श्लोक

यत्र प्रत्यक्षमेवासदन्यत्किं तत्र सद्भवेत् । क्व तत्सत्यं भवेद्वस्तु यदसिद्धेन साध्यते ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

नेत्र आदि प्रमाण से प्रिद्ध हुए प्रव (जगत्‌) का आप कैसे अलाप करते हैं; इस पर कहते हैं / जबकि प्रत्यक्ष साधक चक्षु आदि इन्द्रियाँ ही योगियों की दृष्टि में असत्‌ हैं तब फिर उनसे सिद्ध अन्य पदार्थ क्या सत्‌ हो सकते हैं ? क्योकि जिस वस्तु की सिद्धि असत्‌ से की जाती है वह कहाँ तक सत्‌ होती है ? कहने का तात्पर्य यह है कि असत्‌ से सिद्ध हुए पदार्थ की सत्ता कहीं पर भी देखने में नहीं आती