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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 69, Verse 28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 69, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 28

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

उक्त तत्त्वज्ञान से बाधित अपनी उत्पत्ति ऑर अपना नाम आपके लिए केसे सिद्ध हो सकता है, इस पर कहते हैं । भद्र, मैं चिदाकाशरूप ही हूँ, सदा अपने ही स्वरूप में स्थित हूँ, और व्यवहार करनेवाली प्रजा के सर्ग के उत्पन्न होकर स्थित हो जानेपर उनकी दृष्टि से मेरा नाम स्वयंभू होता है