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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 69, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 69, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

अस्ति तावदजं शान्तमजरं किंचिदेव सत् । ततश्चित्कचनैकान्तरूपिणः कचितोऽस्म्यहम् ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

सबसे पहले उयोद्धातसगरति से अग्रतिहत ज्ञान, वैरग्य, ऐश्वर्य और धर्म-ये वायो जगदीश्वर के साथ-साथ ही सिद्ध है" इस पुराणप्रश्तिद्धि के अनुसार अपनी उत्पत्ति के सम्बन्ध में तात्विक परिज्ञान बतलाने के लिए तथा अपनी उत्पत्ति का स्वरूप बतलाने के लिए कहते हैं / महाराज वसिष्ठजी, ऐसी एक कोई मुख्य वस्तु है, जो अज, शान्त, अजर तथा त्रिकाल में बाधित नहीं होने वाली है इसी का नाम चिति है । इस चिति के एक मात्र प्रकाशनस्वरूप से में उत्पन्न (आविर्भूत) हुआ हूँ