Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 69, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 69, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 30
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हिन्दी अर्थ
तब हम दोनों तत््वज्ञानियों का परस्पर जो ग्रश्नोत्तरादि व्यवहार हो रहा है, वह कैसा है, इस
पर कहते हैं /
भद्र, जो यह तुम, मेरे आगे हो और तुम्हारे आगे मैं हूँ, तथा यह जो अपना परस्पर प्रश्नोत्तररूप
संभाषण है, वह तो उस तरह का है, जिस तरह का कि एक ही समुद्र में एक तरंग के आगे दूसरा
तरंग हो और वही एक समुद्र तरंगों द्वारा परस्पर आघातों से ध्वनि करता हो, यह मेरा सिद्धान्त
है