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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 69, Verses 31–33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 69, verses 31–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 31,32

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

भद्र, इस प्रकार समुद्र से जनित तरंगों के सदृश थोड़ी मात्रा मे कल्पित अपनी और दूसरे की दृष्टि से देखे जानेवाले भेदरूप तथा समयवश अपने स्वरूप के थोड़े से विस्मरण के कारण अस्वच्छस्वरूप हुए चिदाभासरूपी मुझमें जो स्वभाव से “मैं और मेरी” वह वासना ही इस कुमारी को और तुम्हें अन्य-सी भासती है, परन्तु मुझको तो अनन्य ही भासती है, वह वासना हम दोनों पुरुषों की दृष्टि से उदित है और उदित नहीं भी है