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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 70, Verse 12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 70, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 70 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

एतद्यस्मिञ्जगद्यत्र तद्दृषत्त्वं जगद्गिरौ । अस्मज्जगत्पदार्थेषु संत्यन्यानि जगन्त्यपि ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

हम लोगों के अनेक जगद्रूप पदार्थों के अन्दर- जिस जगद्रूप पर्वत के ऊपर यह जगत्‌ है और जिसमें उक्त पत्थर की शिलारूपता है-ऐसे-ऐसे अनेक दूसरे भी जगत्‌ हैं